शिव पूजा विधि: सोमवार और प्रदोष, द्वि-काल लय

शिव हर सोमवार और हर त्रयोदशी (प्रदोष) पर पूज्य हैं, सप्ताह में दो बार। यहाँ है पूर्ण गृह-पूजा विधि, सामग्री-सूची, और मंत्र।

VEVidhata Editorial Desk· Parashari Jyotish, Muhurta, KP, Lal Kitab, dasha & transit analysis
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समीक्षक Vidhata Editorial Desk · अद्यतन

In this article
  1. शिव की दो साप्ताहिक खिड़कियाँ
  2. घर में रखने योग्य स्थायी सामग्री
  3. पूर्ण गृह शिव-पूजा
  4. कुल समय
  5. प्रदोष-विशेष
  6. स्थायी शिव-पूजा से क्या आता है
  7. प्रारम्भिक संकल्प

शिव की दो साप्ताहिक खिड़कियाँ

सोमवार, चंद्र का दिन। चंद्र शिव के मस्तक पर विराजते हैं; दिन का स्वरूप ही शिव-समर्पित है। साप्ताहिक पालन।

त्रयोदशी (प्रदोष), १३वीं तिथि, माह में दो बार। विशेषतः प्रदोष-काल (सूर्यास्त के ठीक पूर्व का संध्या-संगम)।

जो शिव-सम्बन्ध स्थायी रखना चाहते हैं, वे दोनों रखते हैं। सोमवार साप्ताहिक संरक्षण; प्रदोष द्विमासिक तीव्रता।

घर में रखने योग्य स्थायी सामग्री

शिव-भक्त घर में ये वस्तुएँ हमेशा तैयार रहें:

ठोस सामग्री:

  • छोटा शिव-लिंग (कोई भी द्रव्य, मिट्टी, पीतल, स्फटिक, या प्राण-प्रतिष्ठित नदी-पत्थर)
  • बेल-पत्र (ताज़े; घर के पास बेल-वृक्ष आदर्श है, परंतु आवश्यक नहीं)
  • दीप के लिए गाय का घी
  • आरती के लिए कपूर
  • रुद्राक्ष-माला (१०८ दानों की)
  • छोटा घंटा
  • शंख (वैकल्पिक, परंतु शास्त्रीय)
  • लिंग के नीचे रखने के लिए स्वच्छ श्वेत वस्त्र
  • शिव-यंत्र या महामृत्युंजय यंत्र (वैकल्पिक)

नित्य भरने योग्य:

  • ताम्र या स्टील के पात्र में स्वच्छ जल
  • ताज़ा कच्चा दूध (यदि उपलब्ध)
  • दही
  • शहद
  • शक्कर या गुड़
  • चन्दन-लेप
  • विभूति (पवित्र भस्म)
  • कुमकुम (अथवा शिव की प्रिय, भस्म)
  • श्वेत पुष्प (चमेली, कुन्द, श्वेत गुलाब)
  • फल (केला, नारियल)

पूर्ण गृह शिव-पूजा

सोमवार प्रातः हो या प्रदोष संध्या, विधि एक ही है।

१. स्थान-शुद्धि (पाँच मिनट)

  • पूजा-क्षेत्र साफ़ करें
  • लिंग को श्वेत वस्त्र-आसन पर स्थापित करें
  • अगरबत्ती से वातावरण-शुद्धि

२. दीप-प्रज्ज्वलन

  • गाय-घी का दीप अधिक श्रेष्ठ (तिल का तेल भी मान्य)
  • एकल बत्ती, या तीव्रता के लिए पंचमुखी
  • लिंग के बायीं ओर या सम्मुख

३. प्रथम गणेश-स्मरण

  • "ॐ गं गणपतये नमः", ११ बार
  • गणेश-चित्र पर या स्थान-मात्र पर एक पुष्प और थोड़ा अक्षत

४. संकल्प

  • मौखिक रूप से पूजा का प्रयोजन कहें
  • "इस सोमवार/प्रदोष पर मैं भगवान् शिव को यह पूजा अर्पित कर रहा/रही हूँ, [विशिष्ट संकल्प] निमित्त"

५. अभिषेक, केन्द्रीय शिव-कर्म

लिंग को क्रमशः इन सबसे स्नान कराएँ:

  • शुद्ध जल, प्रथम
  • रुकें; "ॐ नमः शिवाय" ११ बार
  • दूध, धीरे-धीरे लिंग पर
  • रुकें; मंत्र ११ बार
  • दही
  • रुकें; मंत्र
  • घी
  • रुकें; मंत्र
  • शहद
  • रुकें; मंत्र
  • शक्कर-जल अथवा शक्कर
  • रुकें; मंत्र
  • शुद्ध जल अंत में (चढ़े हुए द्रव्यों को धो देता है)

प्रत्येक द्रव्य का शास्त्रीय अर्थ है:

  • जल = गंगा (पवित्रीकरण)
  • दूध = पोषण
  • दही = स्थैर्य
  • घी = स्पष्टता
  • शहद = माधुर्य
  • शक्कर = ऐश्वर्य

६. वस्त्र और अलंकरण

  • लिंग पर ताज़ा श्वेत वस्त्र (छोटा-सा)
  • चन्दन-तिलक
  • विभूति, तीन क्षैतिज रेखाएँ
  • चारों ओर ताज़े श्वेत पुष्प

७. बेल-पत्र अर्पण

  • बेल-पत्र शिव-प्रिय हैं। शास्त्रीय निर्देश: एक बार में तीन-पत्र (एक "बिल्व-त्रिक्") चढ़ाएँ। १०८ बार आदर्श, ११ न्यूनतम
  • प्रत्येक त्रिक् पर "ॐ नमः शिवाय" का जप

८. नैवेद्य

  • फल, मिठाई, सरल पका हुआ भोजन
  • लिंग के सम्मुख
  • "ॐ नमः शिवाय" ११ बार

९. मंत्र-जप

दिन के संकल्प के अनुसार चुनें:

  • ॐ नमः शिवाय, सार्वत्रिक, १०८ बार
  • महामृत्युंजय, स्वास्थ्य, सुरक्षा हेतु
  • लिङ्गाष्टकम्, लिंग-स्तुति के ८ श्लोक
  • शिव-तांडव-स्तोत्र, रावण-कृत, १७ श्लोक, तीव्र
  • रुद्रम् चमकम्, लम्बा, शास्त्रीय, संस्कृत-दक्षता आवश्यक

प्रारम्भ में: "ॐ नमः शिवाय" १०८ बार पर्याप्त। धीरे-धीरे आगे बढ़ें।

१०. आरती

  • कपूर अथवा घी-दीप
  • लिंग की प्रदक्षिणा-दिशा में ५-७ बार घुमाएँ
  • "ॐ जय शिव ओंकारा" अथवा "कर्पूर गौरम्" गाएँ
  • अन्त में मौन प्रार्थना

११. प्रदक्षिणा

  • लिंग की ७ बार प्रदक्षिणा (शिव में आधी प्रदक्षिणा का नियम है, लिंग को पूरी परिक्रमा नहीं की जाती; नंदी-पथ बीच में रोक देता है)
  • अथवा बैठे-बैठे ७ मानसिक परिक्रमा

१२. प्रसाद-ग्रहण

  • अर्पित भोजन का छोटा अंश
  • शेष परिवार में

कुल समय

पूरी विधि: ३०-४५ मिनट। अनेक भक्त सोमवार प्रातः कार्यालय जाने से पूर्व यह करते हैं।

लघु दैनिक स्मरण (पाँच मिनट):

  • लिंग के सम्मुख घी-दीप
  • थोड़ा जल
  • तीन बेल-पत्र
  • "ॐ नमः शिवाय" ११ बार
  • संक्षिप्त प्रणाम

यह पाँच-मिनट का रूप साप्ताहिक पूर्ण-पूजा के बीच के दिनों को जोड़े रखता है।

प्रदोष-विशेष

प्रदोष पर (माह में दो बार, सूर्यास्त-पूर्व):

  • वास्तविक प्रदोष-काल का समय (सूर्यास्त से १.५ घंटा पूर्व का काल)
  • पूजा में प्रदोष-व्रत-कथा जोड़ें
  • गुलाब-जल का अतिरिक्त अभिषेक यदि उपलब्ध हो
  • प्रदोष के पश्चात् पड़ोसियों को प्रसाद-वितरण, शास्त्रीय फल बढ़ता है

स्थायी शिव-पूजा से क्या आता है

जिन घरों में यह वर्षों चली है:

  • कठिन परिस्थितियों में कम भय
  • संकटों से तेज़ी से बाहर आना (शिव "अटक" को तोड़ने वाले)
  • दृढ़ वैवाहिक सम्बन्ध (शिव-पार्वती संरेखण)
  • सतत अनुशासन की क्षमता
  • आध्यात्मिक गहराई जो धीमे, परंतु अटल रूप से बढ़ती है

जो वे नहीं देते: तीव्र धन, अचानक प्रेम, सरल जीवन। शिव कठोर परंतु न्यायप्रिय गुरु हैं; उनकी कृपा रूपान्तरण से आती है, उत्तीर्णता-पथ से नहीं।

प्रारम्भिक संकल्प

जो शिव-भक्ति में नए हैं:

११ क्रमिक सोमवार के लिए: १. प्रातः घर में घी-दीप २. लिंग पर जल (या नहीं तो मानसिक अभिषेक, प्रारम्भ में मन्यन से भी काम चलता है) ३. ३ बेल-पत्र (नहीं तो कोई श्वेत पुष्प) ४. "ॐ नमः शिवाय" १०८ बार ५. संक्षिप्त आरती ६. एक फल का प्रसाद-वितरण

११ सप्ताह के बाद मूल्यांकन, क्या आगे बढ़ाना है? अधिकांश जो ११ पूरे करते हैं, बढ़ाते भी हैं। एक वर्ष के साप्ताहिक सोमवार के बाद सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। शिव-भक्ति, स्थिर रूप से, किसी भी परम्परा की सबसे जीवन-परिवर्तक साधनाओं में से एक है।

बुद्धिमत्ता निरन्तरता में है। छोटा प्रारम्भ करें; अटल रहें।

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