सरस्वती पूजा: वसंत पंचमी पर विद्यार्थी, संगीतकार और लेखक माँ से कृपा माँगते हैं
वसंत पंचमी पंचांग का सर्वश्रेष्ठ सरस्वती-पर्व है, परंतु विद्या और कलाओं की देवी का सम्मान विद्यार्थी-कलाकार वाले घरों में नित्य होता है। क्या करें, कब करें, और इससे क्या फलित होता है।
समीक्षक Vidhata Editorial Desk · अद्यतन
In this article
सरस्वती कौन हैं
सरस्वती हिन्दू परम्परा में निम्न क्षेत्रों की अधिष्ठात्री देवी हैं:
- विद्या, ज्ञान, बुद्धि
- संगीत और सम्पूर्ण कलाएँ (विशेषतः शास्त्रीय संगीत और नृत्य)
- वाणी, संवाद, लेखन
- शुद्ध बुद्धि (अहंकार-रहित)
- नदियाँ (विशेषतः वैदिक काल की लुप्त सरस्वती नदी)
उनका शास्त्रीय रूप - हंस या मयूर पर विराजमान, हाथ में वीणा, एक हाथ में पुस्तक, दूसरा वर-मुद्रा में। श्वेत वस्त्र। आभूषण नहीं। ऐश्वर्य के सारे चिह्न उनसे विरत हैं - यही उन्हें लक्ष्मी (कुछ ग्रंथों में उनकी बहन) से पृथक करता है। लक्ष्मी धन, सरस्वती शुद्ध विद्या।
वसंत पंचमी - वर्ष का शिखर
वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी, प्रायः जनवरी अंत या फ़रवरी आरम्भ) सरस्वती का प्रमुख वार्षिक पर्व है। यह वसंत ऋतु का प्रारम्भ-दिन है, और वर्ष का सर्वाधिक शुभ-दिन माना गया है इन कार्यों के लिए:
- बच्चे की औपचारिक शिक्षा का प्रारम्भ (अक्षर-अभ्यास)
- नए वाद्य या कला-रूप का अधिगम-आरम्भ
- विद्या, लेखन, मंच-कला से सम्बद्ध किसी भी कार्य का आरम्भ
- विधिवत सरस्वती पूजा सम्पादन
समस्त भारत के विद्यालय वसंत पंचमी को सरस्वती-पूजा करते हैं। विद्यार्थी अपनी पुस्तकें, वाद्य, और लेखनी देवी के चरणों में रखते हैं, अर्पण के रूप में।
विद्यार्थियों और कलाकारों की दैनिक साधना
जिन घरों में सक्रिय विद्यार्थी या कलाकार हैं, वहाँ नित्य सरस्वती-स्मरण शास्त्र-सम्मत है।
न्यूनतम पाँच मिनट की दैनिक साधना:
१. अध्ययन, रियाज़, या लेखन से पहले, पुस्तकें या वाद्य या लेखन-उपकरण को मस्तक से लगाएँ २. मन ही मन या स्वर में कहें, "ॐ सरस्वत्यै नमः" अथवा "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" ३. एक छोटा संकल्प, "देवि सरस्वति, आज का यह कार्य सच्चे ज्ञान, सौंदर्य, और सम्यक् वाणी की सेवा में हो"
यह पाँच-मिनट की साधना यदि नित्य चले, तो विद्यार्थियों और कलाकारों में मापने योग्य परिवर्तन आता है। एकाग्रता गहरी होती है। कला से सम्बन्ध भी कम चिंतित रहता है। कार्य में एक सहज लालित्य उतरता है।
सरस्वती पूजा-विधि (विद्यार्थियों के लिए)
वसंत पंचमी हो या किसी बड़ी परीक्षा का काल, पूजा का स्वरूप यही रहेगा।
सामग्री:
- सरस्वती-मूर्ति या चित्र (श्वेताम्बरा देवी)
- पीले फूल (विशेषतः गेंदा, सरसों के फूल, पीला उनका रंग है)
- पीला वस्त्र (अर्पित करें या स्वयं पहनें)
- पीली मिठाइयाँ - केसरिया हलवा, बूँदी, मोतीचूर लड्डू
- आशीर्वाद के लिए पुस्तकें, लेखनी, वाद्य
- अक्षत (हल्दी-चावल)
- श्वेत या पीले आसन-वस्त्र पर मूर्ति
- घी का दीप
विधि:
१. पूजा-पूर्व: सूर्योदय-काल में स्नान, पीला या श्वेत वस्त्र। पूजा-स्थान पूर्वाभिमुख।
२. दीप-प्रज्ज्वलन। सर्वप्रथम गणेश-स्मरण, "ॐ गं गणपतये नमः" - ११ बार।
३. पुस्तकें देवी के चरणों में रखें। यह क्रिया केन्द्रीय है, पुस्तकों को देवी के चरणों में रखना अर्थात् विद्या के अहंकार का समर्पण।
४. आवाहन: "देवि सरस्वति, इन पुस्तकों में, इस मन में, इस वाणी में, इस हाथ में आप विराजमान हों। मेरी विद्या ज्ञान की सेवा में हो, अहंकार के लिए नहीं।"
५. पुष्प, अक्षत, मिठाई का अर्पण।
६. मंत्र-जप: - "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः", १०८ बार (विद्यार्थियों के लिए सर्वाधिक प्रभावी) - अथवा सरस्वती-वंदना ("या कुन्देन्दु तुषार-हार-धवला..."), ११ बार यदि १०८ का समय न हो
७. सरस्वती स्तोत्र पाठ, देवी के गुणों की लघु स्तुति।
८. आरती, घी के दीप से।
९. विशिष्ट प्रार्थना, वर्तमान परीक्षा, परियोजना, मंच-प्रस्तुति, अधिगम-लक्ष्य के लिए।
१०. प्रसाद-वितरण, पीली मिठाइयाँ परिजनों और मित्रों को।
पूजा के पश्चात् पुस्तकें उस दिन हटाई या पढ़ी न जाएँ, वे देवी के चरणों में रहें, उनकी ऊर्जा को आत्मसात् करती हुई। अगले दिन अध्ययन उसी ऊर्जा से प्रारम्भ।
या कुन्देन्दु, शास्त्रीय स्तोत्र
या कुन्देन्दु तुषार-हार-धवला, या शुभ्र-वस्त्रावृता या वीणा-वर-दण्ड-मण्डित-करा, या श्वेत-पद्मासना या ब्रह्माच्युत-शंकर-प्रभृतिभिः, देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती, निःशेष-जाड्यापहा
अर्थ: "जो कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा, या हिम जैसी श्वेत हैं; श्वेत वस्त्र-धारिणी; जिनके हाथ में दिव्य वीणा है; जो श्वेत-पद्म पर विराजमान हैं; जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब देव नित्य प्रणाम करते हैं, वही भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें, मेरे मन की समस्त जड़ता को दूर करें।"
परीक्षा या किसी कठिन कार्य से पूर्व इसका एक पाठ ही मन को विशेष रूप से शान्त करता है।
सरस्वती और कलाकार
संगीतकार, नर्तक, लेखक, चित्रकार के लिए सरस्वती-सम्बन्ध विद्यार्थी से कहीं अधिक गहरा है। उनका दैनिक रियाज़ या लेखन ही नित्य पूजा है। कुछ विशेष जुड़ाव:
- हर अभ्यास या प्रस्तुति से पहले, वाद्य या पन्ना मस्तक से लगाएँ, आवाहन करें
- वार्षिक वसंत पंचमी प्रस्तुति, अनेक कलाकार वर्ष की प्रथम रचना देवी को अर्पित करते हैं
- अहंकार-त्याग, सरस्वती शुद्ध कला की देवी हैं; मात्र प्रसिद्धि या धन के लिए कला सम्बन्ध को क्षीण करती है
यही कारण है कि भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञ चरम ख्याति में भी एक विनम्रता रखते हैं जो पाश्चात्य श्रोता को प्रायः चकित करती है। सरस्वती-सम्बन्ध संरचना से ही विनम्र है।
वे क्या नहीं देतीं
वे शुद्ध विद्या की देवी हैं। ये उनकी विधा नहीं:
- धन (वह लक्ष्मी का क्षेत्र)
- बिना श्रम की सफलता (सरस्वती मात्र वास्तविक श्रम पर कृपा करती हैं)
- त्वरित परिणाम (विद्या धीमी है; वे धैर्य सिखाती हैं)
- आसान उत्तर (वे विवेक देती हैं, जो प्रायः कठिन प्रश्न उत्पन्न करता है)
एक सामान्य भूल: बिना पढ़े परीक्षा के लिए सरस्वती से प्रार्थना। वे कुछ कृपा अवश्य देंगी, परंतु उनकी कृपा गुण से चलती है, चमत्कार से नहीं। पढ़ा हुआ विद्यार्थी जो प्रार्थना भी करे, उसे आशीर्वाद मिलता है। न पढ़ने वाला लॉटरी माँग रहा है।
पीढ़ियों का अनुभव
जो परिवार पीढ़ियों तक सरस्वती-सम्बन्ध बनाए रखते हैं, उनमें ये पैटर्न देखे गए:
- अनेक स्तरों पर बलवान विद्यार्थी
- वास्तविक कलाकार (मात्र मंच-व्यक्ति नहीं, कला के प्रति समर्पित)
- वाक्-कुशल, सुसंस्कृत परिजन
- तुच्छ वाद-विवाद कम, सरस्वती के क्षेत्र में सम्यक्-वाणी आती है, जो पारिवारिक मौखिक आक्रोश को सीमित करती है
ये अवलोकन पीढ़ी-दर-पीढ़ी देखे गए हैं। जिन घरों में यह सम्बन्ध छूट गया, वहाँ विद्या प्रायः अधिक चिंतापूर्ण हो गई, कला कैरियर-केन्द्रित, वाणी असावधान।
एक प्रारम्भिक संकल्प
यदि घर में विद्यार्थी या कलाकार हैं:
एक शैक्षिक वर्ष के लिए:
१. वसंत पंचमी पर पूर्ण सरस्वती पूजा, पुस्तकें देवी-चरणों में २. नित्य पाँच मिनट का पुस्तक-स्पर्श अनुष्ठान ३. हर बड़ी परीक्षा या प्रस्तुति से पहले सरस्वती-वंदना ११ बार ४. महीने में एक बुधवार (बुध सरस्वती की विद्या-शक्ति का मित्र है) घी का दीप जलाकर "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" २१ बार
एक वर्ष के पश्चात् अवलोकन कीजिए, क्या विद्यार्थी या कलाकार के अपने कार्य से सम्बन्ध में कुछ बदला। अधिकांश जो यह करते हैं, कुछ-न-कुछ रूपान्तरण की रिपोर्ट देते हैं, कभी विशिष्ट परिणाम (बेहतर अंक, बेहतर प्रस्तुति), कभी गहरा (कम चिंता, कला से अधिक प्रेम)।
गहरा रूपान्तरण ही देवी का वास्तविक उपहार है। वे केवल परीक्षा-अंकों की देवी नहीं, शुद्ध विद्या की देवी हैं। दोनों आते हैं जब सम्बन्ध सच्चा हो।