पंच महापुरुष · बीपीएचएस अध्याय 36, फलदीपिका 6.3
हंस योग (पंच महापुरुष)
बृहस्पति स्वराशि (धनु, मीन) या उच्च (कर्क) में और किसी केन्द्र (1, 4, 7, 10) में।
हंस योग पाँच पंच महापुरुष योगों में तीसरा है तथा बृहस्पति का है। नाम हंस का अर्थ है दिव्य पक्षी, जो भारतीय परम्परा के अनुसार दूध से जल अलग कर सकता है (वह बुद्धि जो आभास से सार को अलग करती है)। योग तब बनता है जब बृहस्पति, सबसे बड़ा शुभ ग्रह, स्वराशि (धनु या मीन) में या उच्च (कर्क) में हो और साथ ही केन्द्र भाव में हो। हंस धार्मिक शिक्षक, नैतिक प्राधिकार और बुद्धि के दाता का योग है।
हंस योग (पंच महापुरुष) कैसे बनता है
हंस योग तब बनता है जब बृहस्पति स्वराशि (धनु या मीन) में हो या कर्क में उच्च हो, और साथ ही लग्न से किसी केन्द्र भाव (1, 4, 7, 10) में हो। प्रथम भाव में कर्क का बृहस्पति या दशम में धनु का बृहस्पति शास्त्रीय उदाहरण हैं। हंस पाँच महापुरुष योगों में सबसे एकसमान शुभ माना जाता है क्योंकि बृहस्पति कुंडली का प्राकृतिक शुभ ग्रह है।
जातक पर प्रभाव
जातक पर फल: नैतिक प्राधिकार, ऐसी बुद्धि जिसे यथार्थ परामर्श हेतु खोजा जाता है, शिक्षण, विधि, परामर्श अथवा धार्मिक वृत्तियों में सफलता, आचरण की गरिमा, सामान्य रूप से आदरणीय प्रतिष्ठा, तथा दबाव में सत्यनिष्ठा बनाए रखने की असामान्य क्षमता। अनेक प्रसिद्ध शिक्षक, न्यायाधीश, परोपकारी और वरिष्ठ परामर्शदाता हंस प्रबल पाते हैं। योग शान्त उपस्थिति देता है: लोग प्रायः हंस-जातक के सान्निध्य में सहज हो जाते हैं।
बल के कारक
हंस सबसे बलवान तब है जब बृहस्पति दुस्थान में वक्री न हो, अस्त न हो (बृहस्पति की मन्द गति के कारण यह दुर्लभ है), और शनि या राहु से निकट से पीड़ित न हो। चन्द्र की दृष्टि (गजकेसरी का सहावरण उत्पन्न करते हुए) और बल देती है। चतुर्थ भाव में कर्क का उच्च बृहस्पति (स्वगरिमा, केन्द्र, गहरा आध्यात्मिक स्थान) सबसे प्रबल हंस विन्यासों में एक है।
भंग और सीमाएँ
भंगकारी कारक: शनि से निकट युति (गुरु-शनि टकराव), 6/8/12 में वक्री बृहस्पति, राहु से निकट पीड़ा (गुरु-चांडाल योग), अथवा बृहस्पति की राशिस्वामी का दुर्बल होना। हंस पूर्णतया भंग होना दुर्लभ है क्योंकि बृहस्पति का प्राकृतिक शुभ स्वभाव बना रहता है; प्रभाव मंद होते हैं, उलटते नहीं।
मूल स्वरूप
हंस का प्रतिरूप: वह विश्वसनीय शिक्षक जिसके विद्यार्थी दशकों बाद भी जीवन-परामर्श हेतु लौटते हैं, वह वरिष्ठ न्यायाधीश जो निष्पक्षता हेतु आदरणीय है, वह परोपकारी जो शान्ति से दान देता है, वह धार्मिक प्राधिकार जो वास्तविक विद्वत्ता हेतु प्रसिद्ध है। प्रदर्शनकारी गुरु नहीं, विवेकी।
शास्त्रीय स्रोत
बीपीएचएस अध्याय 36 हंस को पंच महापुरुष का तीसरा बताता है। फलदीपिका 6.3 हंस को सभी नामित योगों में सर्वाधिक भरोसेमंद शुभ बताती है। सारावली कहती है कि हंस के फल स्थिर, साधारण रूप से चमकीले नहीं, परंतु दशकों तक टिकाऊ रहते हैं।
हंस योग (पंच महापुरुष) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हंस योग कैसे बनता है?+
बृहस्पति को स्वराशि (धनु या मीन) में या कर्क में उच्च होना चाहिए और साथ ही लग्न से किसी केन्द्र भाव (1, 4, 7, 10) में स्थित होना चाहिए।
हंस योग क्या देता है?+
नैतिक प्राधिकार, यथार्थ परामर्श हेतु खोजी जाने वाली बुद्धि, शिक्षण, विधि, परामर्श या धार्मिक वृत्तियों में सफलता, आचरण की गरिमा तथा दबाव में सत्यनिष्ठा।
क्या हंस सबसे शुभ महापुरुष योग है?+
सामान्यतः ऐसा माना जाता है, क्योंकि बृहस्पति कुंडली का प्राकृतिक शुभ ग्रह है। हंस के फल शास्त्रीय टीका में एकसमान सकारात्मक रहते हैं, अन्य कारक मिश्रित होने पर भी।
हंस योग को क्या भंग करता है?+
शनि से निकट युति, 6/8/12 में वक्री बृहस्पति, गुरु-चांडाल योग (बृहस्पति-राहु निकट), अथवा दुर्बल राशिस्वामी। हंस पूर्ण भंग होना दुर्लभ है किंतु मंद हो सकता है।
क्या हंस गजकेसरी के साथ आ सकता है?+
हाँ, अक्सर। जब चन्द्र बृहस्पति से केन्द्र में हो और बृहस्पति लग्न से केन्द्र में स्वराशि या उच्च में हो, तब दोनों योग बनते हैं। यह संयोजन एक प्रबल बुद्धि-संकेत है।
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