वह आदिवासी स्त्री जिसने राम को अर्पित करने से पहले हर बेर स्वयं चखा
शबरी एक वृद्ध, निम्न-जाति की वन-स्त्री थी जिसने राम से मिलने के लिए जीवन भर प्रतीक्षा की। जब वे अंततः आए, उसने वह किया जो अनुष्ठानिक रूप से असंभव होना चाहिए था। हर बेर अर्पित करने से पहले स्वयं चखा। राम मुस्कराए और सब खा गए।
समीक्षक Vidhata Editorial Desk · अद्यतन
In this story
दादी हर बेर पहले चखती थी
एक प्रातः दो यात्री उग आए वन-मार्ग पर चलते आए, श्याम-वर्ण आगे, उज्ज्वल वर्ण पीछे, दोनों के पास धनुष। एक त्यागे हुए आश्रम के आँगन में बैठी वृद्ध आदिवासी स्त्री ने उन्हें देखा और जान गई। वह ठीक इसी क्षण की साठ वर्षों से प्रतीक्षा कर रही थी।
वह काँपती टाँगों पर दौड़ी और सामने वाले के चरणों में गिर पड़ी।
एक आदिवासी बालिका कैसे प्रतीक्षा में बैठ गई
शबरी वन-समुदाय की बालिका थी, मंत्रों और अनुष्ठानों के लिए खिंची हुई, जबकि उस समय का कोई आश्रम निम्न-जाति की स्त्री को भीतर नहीं आने देता था। वह द्वार-द्वार से दहलीज़ों के पार सुनती रही। अंततः मतंग नाम के एक ऋषि ने उसे रख लिया। वे ऐसे शिक्षक थे जो छात्र से उसका जन्म नहीं पूछते थे। वह उनके आश्रम में रहती और सन्ध्या में सीखती।
मरने से पहले मतंग ने उससे कुछ कहा। बेटी, प्रभु राम एक दिन इन वनों से गुज़रेंगे। उन्हें जो भी तुम्हारे पास हो, अर्पित करना। वे तुम से स्वीकार करेंगे।
उसने नहीं पूछा कब। नहीं पूछा उन्हें कैसे पता। उसने यह स्वीकार कर लिया।
मतंग गुज़र गए। शेष आश्रमवासी छँट गए। मार्ग पर खरपतवार उग आई। वह वहीं रही।
साठ वर्ष के बेर
हर प्रातः वह वन में एक बेर के पेड़ तक जाती। उस पेड़ के कुछ बेर मीठे होते, कुछ खट्टे, कुछ कड़वे, इस पर निर्भर कि वे किस दिशा में उगे थे। वह एक टोकरी तोड़ती। आँगन की सीढ़ी पर बैठकर हर एक को चखती। खट्टे अपने भोजन के लिए अलग रख लेती। मीठे एक छोटे मिट्टी के पात्र में उनके लिए डाल देती।
वह यह साठ वर्ष करती रही। उसके बाल श्वेत हो गए। हाथ काँपने लगे। मार्ग साफ नहीं कर पाती थी। दीपक फिर भी जलाए रखती।
किसी कृपा से मिट्टी के पात्र में बेर सड़ते नहीं थे।
जिस प्रातः वे आए
श्याम-वर्ण यात्री ने कोमलता से उसे उठाया। माँ। मैं इसलिए आया हूँ क्योंकि आपने प्रतीक्षा की है। अपना आतिथ्य दिखाइए।
उसने अपने ही हाथों और अपने ही आँसुओं से उनके चरण धोए। फिर मिट्टी का पात्र लाई। बेर खिलाने लगी।
हर बेर देने से पहले, वह उसे अपने मुख में रखती।
लक्ष्मण कठोर हो गए। मेज़बान के मुख से छुआ भोजन जूठा होता है, अतिथि को नहीं दिया जाता, अवतार को तो कदापि नहीं। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वे क्या देख रहे हैं।
राम ने भाई की ओर देखा। फिर उस वृद्ध स्त्री की ओर, जो चखते-चखते रो रही थी, केवल सबसे मीठे चुनती, हाथ इतने काँप रहे थे कि कई बार गिराते-गिराते बचाती।
वे मुस्कराए। उन्होंने हर बेर उसके काँपते हाथ से लेकर खाया। हर एक खा गए।
पात्र खाली होने पर शबरी उनके चरणों में आनंद से रोती बैठ गई। मेरे प्रभु। मतंग ने कहा था आप आएँगे। मुझे पता नहीं था कि सच है या नहीं। मैंने प्रतीक्षा की।
राम ने उसके सिर पर हाथ रखा। आपने जो बेर दिए, वे मेरे वनवास के सबसे अमूल्य भोज हैं। हर एक भक्त के प्रेम से चुना गया था। आपने जो अनुष्ठान-नियम तोड़ा, वह इस राज्य में सदा के लिए टूटा।
लक्ष्मण की असहजता विलीन हो गई।
बाद में मार्ग पर लक्ष्मण ने पूछा। राम ने बिना मुड़े उत्तर दिया। उन्होंने अनादर के लिए नहीं चखा। उन्होंने इसलिए चखा कि कुछ खट्टा मेरी जीभ तक न पहुँचे। वह चखना प्रेम था। प्रेम सर्वोच्च अनुष्ठान है। शेष सब उसके सामने अप्रासंगिक हो जाता है।
यदि आप अब भी किसी ऐसे के लिए अपनी टोकरी से खट्टे बेर निकाल रहे हैं जिनसे आप कभी नहीं मिलेंगे, यह कथा आपसे बस यह कह रही है कि करते रहिए।