वह बालक जो राजा के यज्ञ में अकेला चला गया और महानाश रोक दिया
राजा जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पृथ्वी के हर साँप का बलिदान करने का व्रत लिया। ब्राह्मण बालक अस्तिक अकेला यज्ञ-शाला में चला आया, और उसका एक वाक्य अग्नि को रोक गया।
समीक्षक Vidhata Editorial Desk · अद्यतन
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जलते यज्ञ में चलता एक बालक
बालक श्वेत वस्त्र में पहरेदारों के पास से ऐसी शुद्ध संस्कृत बोलता हुआ निकला कि आदेश के बिना भाले झुक गए। पीछे यज्ञ-कुंड गरज रहा था। मंत्रों से खिंचे साँप वायु से गिर रहे थे, एक बार फुफकारकर जल जाते। ब्राह्मण नहीं रुकते थे। द्वार पर जली नागिनों की गंध अब साधारण हो चुकी थी।
वह पंद्रह वर्ष का था। उसका नाम था अस्तिक।
अग्नि क्यों जली
राजा जनमेजय को सिंहासन और शोक दोनों विरासत में मिले थे। उनके पिता परीक्षित शिकार करते समय एक हिरण पर तीर चूक गए थे, और वह तीर ध्यानमग्न ऋषि के कंधे में जा लगा। लज्जित होकर परीक्षित ने एक मरा साँप ऋषि के गले में डाल दिया और चले गए। ऋषि का पुत्र लौटा, अपमान देखा, और शाप दिया कि जिसने यह किया उसे नाग-राज तक्षक सात दिन में डस ले।
परीक्षित ने स्तंभों पर बना महल बनवाकर अपने को बंद कर लिया, चारों ओर वैद्य और मंत्र-विशेषज्ञ बैठा दिए। सातवें दिन सायं एक ब्राह्मण फल लेकर दरबार में आया। फलों में से एक में तक्षक कीड़े के रूप में छिपा था। उसने राजा के हाथ पर चढ़कर डसा। परीक्षित मर गए।
जनमेजय तब छोटे थे। वे यह कथा हाथ में थामे बड़े हुए।
जब उनके ऋषियों ने बताया कि एक यज्ञ है, सर्प-सत्र, जिसके मंत्र पृथ्वी के हर साँप को एक अग्नि में खींच लेंगे, उन्होंने पल भर नहीं सोचा। कुंड खोदा गया। ब्राह्मण बैठाए गए। मंत्र आरंभ हुए। दिनों तक हर वन और गुफा से साँप चीखते हुए अग्नि में गिरते रहे। नाग-राज वासुकि अपनी भूमिगत नगरी में बैठे अपनी प्रजा को मिटते अनुभव कर रहे थे।
माता
वासुकि की बहन ऋषि जरत्कारु से ब्याही थी। उनके पुत्र अस्तिक में माँ का नाग-रक्त और पिता का ब्राह्मण-संस्कार दोनों थे।
वह रोती हुई उसके पास आई। "तुम्हारे मामा जल जाएँगे। हमारी पूरी जाति राख हो जाएगी। तुम अकेले मिश्रित-रक्त हो। ब्राह्मण-मंत्र तुम्हें खींच नहीं सकता। उस यज्ञ में जाओ और रोको।"
उसने स्नान किया। श्वेत वस्त्र पहने। चल पड़ा।
वरदान
यज्ञ-शाला के भीतर जनमेजय ने बालक का सस्वर पाठ सुना और प्रसन्न होकर पास बुलाया।
"बालक, तुम इस यज्ञ की उचित स्तुति करते हो। तुम्हारा नाम क्या है?"
"अस्तिक, महान राजा।"
राजाओं की रीति से जनमेजय ने वरदान का प्रस्ताव दिया। माँगो, राजा ने कहा। मेरी शक्ति में जो है, दूँगा।
अग्नि गरज रही थी। ब्राह्मण मंत्रों के बीच रुके। साँप गिरते रहे।
अस्तिक स्पष्ट बोला। "महान राजा, मैं केवल यह माँगता हूँ। यज्ञ रोक दो।"
दरबार में सन्नाटा छा गया। मंत्र टूट गए। जनमेजय का मुख श्वेत हो गया।
"तुम मुझसे आरंभ हुए यज्ञ को छोड़ने को कहते हो, सहस्र ब्राह्मण कार्यरत, मेरे पिता की मृत्यु का बदला अधूरा?"
"हाँ। ऐसे साँप मर रहे हैं जो आपके पिता से कभी मिले नहीं। माताएँ, शिशु, साँप-रूप वाले ऋषि। आप एक मृत्यु का उत्तर लाखों मृत्यु से नहीं दे सकते। आपके वंश का सम्मान संयम के लिए था, क्रोध के लिए नहीं। समाप्त करो।"
राजा बहुत देर बैठे रहे। बालक मुश्किल से पंद्रह का था। दरबार उसे देख रहा था। वह राजा को देख रहा था। फिर जनमेजय ने हाथ उठाया। यज्ञ समाप्त, उन्होंने कहा। मैंने तक्षक की जाति के बहुत मार लिए। शेष इस ब्राह्मण के कारण बचते हैं।
अग्नि बुझा दी गई। वासुकि और उनकी बची प्रजा जीवित रहे।
आज भी कुछ परंपराओं में नाग-भूमि पार करने से पहले अस्तिक का नाम तीन बार बुलाया जाता है, उसे जीते वचन का स्मरण करने के लिए।