वह काठ जो बहकर पुरी पहुँचा, और जगत के स्वामी के हाथ क्यों नहीं हैं
राजा इन्द्रद्युम्न ने स्वप्न में ईश्वर को देखा और उन्हें कहा गया: एक सुगन्धित काष्ठ का टुकड़ा पूर्वी समुद्र के तट पर बहकर आएगा। उसी से मेरी मूर्ति गढ़ना। पर वह गढ़ाई पूरी नहीं हो पाई, और यही सारा मर्म है।
समीक्षक Vidhata Editorial Desk · अद्यतन
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वह द्वार जो रानी ने तोड़ डाला
कक्ष चौदह दिनों से बन्द था। भीतर से लगातार आ रही थी टंकी पर काष्ठ की एक स्थिर ध्वनि। चौदहवें दिन वह ध्वनि रुक गई। रानी गुण्डिचा से वह मौन सहा न गया। उन्होंने राजा का वचन तोड़ दिया। द्वार ज़बरदस्ती खोल डाला।
भीतर, बढ़ई जा चुका था। फर्श पर तीन अधूरी मूर्तियाँ खड़ी थीं, गढ़ाई के बीच ही छोड़ दी गई थीं। दो बड़ी आकृतियाँ, एक श्याम, एक श्वेत। उनके बीच एक छोटी, स्वर्ण-वर्ण की। किसी के उचित हाथ नहीं थे। किसी के उचित पैर नहीं थे। उनके मुख विशाल थे, आँखें असाधारण रूप से बड़ी, और होंठों पर एक विचित्र मुस्कान, मानो भीतर हँसी रोक रखी हो।
ये तीन ही हैं, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, पुरी की त्रयी। एक हज़ार वर्षों से अधिक समय से वे ठीक उसी अधूरे रूप में विराजमान हैं। यह क्यों है, इसे समझने के लिए हमें उस राजा के पास लौटना होगा जिसे किसी भी मन्दिर में ईश्वर न मिले।
वह राजा जिसे किसी भी मन्दिर में ईश्वर न मिले
पुरी का महान मन्दिर बनने से बहुत पहले, ओडिशा के पूर्वी तट पर अवन्ती के एक राजा का राज्य था, इन्द्रद्युम्न। वे धनी थे, न्यायप्रिय थे, और परम भक्त थे। पर एक असन्तोष उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रहा था। वे अपने राज्य के और उसके परे के हर तीर्थ में जा चुके थे, और हर एक में वही प्रश्न पूछते थे:
"क्व नीलमाधवो देवः? कुत्र तस्य निवासिनः?" (कहाँ हैं वे श्यामल नीलमाधव? कहाँ बसते हैं वे जो उन्हें जानते हैं?)
वे नीलमाधव की खोज में थे, विष्णु का वह रूप जिसकी पूजा, गहन गोपनीयता में, पूर्वी समुद्र के निकट के वनों में रहने वाली एक सबर जनजाति करती थी, ऐसी प्रसिद्धि थी। किसी ब्राह्मण ने उन्हें कभी न देखा था। किसी राजा को निकट तक पहुँचने की अनुमति न थी। सबर लोग अपने देवता को नीलाचल नामक एक नीली पहाड़ी की गुफा में रखते थे, और जो भी देखने आता, उसे मार डालते थे।
इन्द्रद्युम्न ने चार भाइयों को गुप्तचर बनाकर भेजा। तीन तो वन की सीमा से ही लौटा दिए गए। चौथा, विद्यापति, इतना चतुर निकला कि उसने वह कर दिखाया जो शेष तीन न कर सके: उसने सबर मुखिया की पुत्री से विवाह कर लिया।
मुखिया का नाम था विश्ववसु। वे नीलमाधव को अपने कुल देवता के रूप में पूजते थे, गहरे नीलमणि-वर्ण के पाषाण की एक मूर्ति, जो उन्हें पितामह के पितामह से उत्तराधिकार में मिली थी। प्रतिदिन वे एक छिपी हुई गुफा में ताज़ी तुलसी ले जाते। पाषाण को वन के मधु से स्नान कराते। हर आखेट का प्रथम भाग देवता को अर्पित करते।
वे किसी बाहरी को निकट न आने देते।
नीली पहाड़ी की गुफा
विद्यापति उस परिवार में दामाद बनकर आया। उसने खेतों में काम किया। आदिवासी भाषा सीखी। एक पूरा वर्ष प्रतीक्षा की, तब जाकर अपने श्वसुर से एक सावधान प्रश्न पूछा।
"पिताजी, आपके घर की यह समृद्धि कहाँ से आती है? कोई मौन कृपा अवश्य होगी।"
विश्ववसु वृद्ध हो चले थे। वे यह सोचने लगे थे कि अब इस रहस्य को सौंपने योग्य उनका कोई पुत्र नहीं, बस एक पुत्री है, जिसका विवाह इस सौम्य परदेसी से हो चुका है। उन्होंने उस पर विश्वास करने का निर्णय किया।
"चलो। पर तुम्हारी आँखों पर पट्टी बँधी होगी। तुम मार्ग नहीं देखोगे। और अपनी पत्नी की प्राण-शपथ लेकर वचन दोगे कि किसी और से कभी न कहोगे।"
विद्यापति ने शपथ ली। उसकी आँखों पर उसकी पत्नी की साड़ी की एक पट्टी बाँध दी गई। विश्ववसु उसका हाथ पकड़कर वन में से ले चले। पर विद्यापति ने अपनी धोती में सरसों के बीजों की एक छोटी पोटली छिपा रखी थी। हर पग पर वह एक बीज गिराता गया।
गुफा में पहुँचकर पट्टी खोली गई। विद्यापति ने पहली बार देखा वह गहरे नीले पाषाण का रूप, नीलमाधव, विष्णु का वह सबसे प्राचीन और जनजातीय स्वरूप। राजमहल के मन्दिरों के परिमार्जित देवता नहीं। वन के देवता। पहाड़ के देवता। उस देवता को जिसे इस भूमि के मूल लोग किसी भी नगर के बसने से पहले से प्रेम करते आए थे।
उसने प्रणाम किया। वह रोया। वह लौट आया।
सरसों के बीज और टूटा हुआ विश्वास
वह वर्षा-ऋतु थी। विद्यापति ने जो सरसों के बीज मार्ग में गिराए थे, हर एक अंकुरित हो गया। कुछ ही सप्ताहों में, पीले फूलों की एक पगडण्डी सीधे गाँव से नीलाचल पहाड़ी की उस गुफा तक पहुँच गई।
विद्यापति ने राजा इन्द्रद्युम्न को सन्देश भेजा। राजा अपनी सेना लेकर तत्काल चल पड़े।
पर जब राजा का जुलूस गुफा तक पहुँचा, तब वह पाषाण-मूर्ति लुप्त हो चुकी थी।
नीलमाधव अन्तर्धान हो चुके थे। विश्ववसु, जो अपने जामाता के विश्वासघात से आहत थे, के पास दिखाने को कुछ शेष न रहा। वे रिक्त गुफा के बाहर बैठ गए और न खाते थे, न पीते थे।
उसी रात, अपने शिविर में, इन्द्रद्युम्न को एक स्वप्न आया। एक स्वर गहरी ओड़िया लय में बोला, उसी छन्द में जिसे आज भी रथ यात्रा के समय तीर्थयात्री गाते हैं:
"ଦାରୁ ରୂପେ ମୁଁ ଆସିବି, ଚକ୍ର ତୀର୍ଥ ସମୁଦ୍ର କୂଳେ - ନ ଚଳିବ କଳ୍ପନା, କେବଳ ଶ୍ରଦ୍ଧା ।" (काष्ठ के रूप में मैं आऊँगा, चक्र-तीर्थ के समुद्र-तट पर, कोई गणना न चले, केवल श्रद्धा।)
स्वर ने उनसे कहा: पाषाण को मत खोजो। वह पाषाण तो जनजातीय युग के लिए था। एक नया रूप आ रहा है। एक सुगन्धित काष्ठ का टुकड़ा, दारु, तट पर बहकर आएगा। एक मन्दिर बनाना। उसी काष्ठ से मेरी मूर्ति गढ़ना।
वह काठ जो तट पर आ लगा
कई दिनों तक राजा चक्र-तीर्थ पर बैठे रहे, वह सर्पिल आकार का रेत-तट जहाँ नदी पूर्वी समुद्र से मिलती है। फिर एक प्रातः, मछुआरे दौड़ते हुए आए।
एक विशाल सुगन्धित काष्ठ का लट्ठा, गहरे शहद के रंग का, लहरों में लुढ़कता आ रहा था। उस पर अंकित थे शंख-चक्र-गदा-पद्म के चिह्न, शंख, चक्र, गदा, कमल, विष्णु के चार चिह्न, मानो वृक्ष ने स्वयं उन्हें उगाया हो, काष्ठ में अन्तर्निहित।
सौ पुरुष भी उस लट्ठे को न उठा सके। राजा ने प्रयत्न किया। ब्राह्मणों ने प्रयत्न किया। लट्ठा हिलने को तैयार न हुआ।
तब, एक और स्वप्न में, स्वर ने कहा: सबर मुखिया विश्ववसु को बुलाओ। केवल मूल रक्षक ही मुझे उठा सकता है।
वृद्ध को बुला भेजा गया। वे आए, अब भी अपनी खोई हुई गुफा-देवता के लिए रोते हुए। उन्होंने अकेले ही उस लट्ठे को छुआ, और वह उठ गया, मानो उसका कोई भार ही न हो। विश्ववसु के हाथ के स्पर्श से वह लट्ठा उठा और उस ऊँचे टीले तक ले जाया गया जहाँ आज मन्दिर खड़ा है।
वह शिल्पी जिसने एक शर्त रखी
राजा ने उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शिल्पकारों को बुलाया। कोई भी उस काष्ठ को काट तक न सका। फलक भोथरा हो जाता। टंकी टूट जाती। काष्ठ मानो उन्हें अस्वीकार कर देता।
एक श्वेत-दाढ़ी वाला वृद्ध बढ़ई द्वार पर आ खड़ा हुआ। उसका नाम कोई न जानता था। उसने अपना नाम बताया अनन्त महाराणा, पर ब्राह्मणों ने उसे पहचान लिया, वे थे विश्वकर्मा, देवों के दिव्य शिल्पी, छद्मवेश में।
उन्होंने एक शर्त रखी।
"ମୁଁ ଅଠର ଦିନ ଭିତରେ ତିନି ଦେବତା ଗଢିବି । କୋଠରୀ ବନ୍ଦ ରହିବ । କେହି ଦେଖିବେ ନାହିଁ । କେହି ଶୁଣିବେ ନାହିଁ ।" (मैं इक्कीस दिनों में तीन देवताओं को गढ़ूँगा। कक्ष बन्द रहेगा। कोई न देखेगा। कोई न सुनेगा।)
राजा सहमत हो गए। कक्ष बन्द कर दिया गया। गढ़ाई शुरू हुई। और चौदहवें दिन, जैसा हम पहले से जानते हैं, रानी ने द्वार तोड़ डाला।
स्वामी के हाथ क्यों नहीं हैं
राजा रोते हुए गिर पड़े। उन्होंने सब कुछ नष्ट कर दिया था। वचन तोड़ दिया था। मूर्ति का गढ़ाव अधूरा रह गया था।
उस रात, विष्णु ने उनसे तीसरी बार कहा:
"ଯାହା ଗଢ଼ିଲେ, ସେତିକି ଠିକ୍ । ମୁଁ ହାତ ବିନା ବି ସମସ୍ତ ବିଶ୍ୱକୁ ଧରିଥାଏ । ମୁଁ ପାଦ ବିନା ବି ସବୁଠି ପହଞ୍ଚେ ।" (जो गढ़ा गया, वही उचित है। हाथों के बिना भी मैं समस्त ब्रह्माण्ड को धारण करता हूँ। पैरों के बिना भी मैं सर्वत्र पहुँचता हूँ।)
वह अधूरा रूप ही असली रूप था। जिस देवता के हाथ दृश्य हैं, वह केवल उतना ही धारण कर सकता है जितना हाथ धारण कर सकते हैं। जिस देवता के हाथ अदृश्य हैं, वह सब कुछ धारण करता है।
वे आँखें, विशाल, बिना पलक की, फैली हुई, इसलिए इतनी बड़ी हैं क्योंकि जब संसार देख रहा हो, तब दैवी सत्ता पलक झपकाने का साहस नहीं कर सकती। पुरी मन्दिर में जो भी भक्त प्रवेश करता है, वह सबसे पहले उन्हीं असम्भव गोल आँखों से मिलता है। वे आपको आपसे पहले देख लेती हैं।
ओड़िया माताएँ अपनी सन्तानों से कहती हैं: "देखो, जगन्नाथ कितनी कृपा से तुम्हें देखते हैं। वे केवल अच्छाई देखते हैं। वे पलक झपककर भी उसे ओझल नहीं कर सकते।"
प्रत्येक बारह से उन्नीस वर्षों के अन्तराल पर, नवकलेवर अर्थात् नया शरीर नामक एक अनुष्ठान में, काष्ठ-मूर्तियाँ बदली जाती हैं, विष्णु के चार चिह्नों से अंकित नीम वृक्षों से, जिन्हें स्वर्ण कुठारों से काटा जाता है, फिर से आधा गढ़ा जाता है। आत्म-तत्व, एक सीलबन्द पोटली जिसे किसी पुरोहित को देखने की अनुमति नहीं, अर्धरात्रि को पूर्ण अन्धकार में अन्तरित किया जाता है, उस पुरोहित द्वारा जो परम्परा के अनुसार जीवन भर के लिए नेत्रहीन हो जाता है।
सबर मुखिया विश्ववसु के वंशज, दैतापति, आज भी इस अनुष्ठान के समय अकेले ही मूर्ति का स्पर्श करते हैं। वे मूल जनजातीय लोग जिन्होंने सबसे पहले ईश्वर को एक गुफा में रखा था, आज भी उन्हीं को धारण करने वाले हैं।
जब आप पुरी के गर्भगृह में खड़े होते हैं और उन असम्भव आँखों, बिना हाथ के धड़ों, उस मुस्कान को ऊपर उठकर देखते हैं, तब आप ठीक उस क्षण को देख रहे होते हैं जब विश्वकर्मा ने अपने उपकरण रख दिए थे। एक हज़ार वर्षों से वह कक्ष ठीक उसी अवस्था में छोड़ दिया गया है। स्वामी ने स्वयं ही पूर्ण न होने का चयन किया है।